Saturday, September 29, 2018

नव चक्र निरूपण

सिद्ध सिद्धांत पद्धति ग्रंथ में  द्वितीय उपदेश में 9 चक्र निरूपण इस पिंड में नव चक्र हैं का वर्णन है

प्रथम

ब्रह्म चक्र

मूलाधार में होता है यह तीन बार आवृत गोलाकार के चारों ओर घुमा हुआ त्रिकोण भगमण्डल के सदृश है। उसके समीप ही मूल कंद है वहां योगी को अग्नि के आकार वाली शक्ति का ध्यान करना चाहिए उसी स्थान पर कामरूप पीठ है। जिसके ध्यान करने मात्र से समग्र कामनाओं की पूर्ति हो जाती है।

द्वितीय

स्वाधिष्ठान चक्र

है उस के मध्य में मूंगे के अग्रभाग के सदृश पश्चिम पीछे की ओर मुख वाला शिवलिंग है उसका ध्यान करना चाहिए यही उड्डियान  पीठ भी है इस शिवलिंग की उपासना करने से साधक जगत के प्राणियों को अपनी ओर आकृष्ट करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है।

तृतीय

नाभि चक्र 
है या सर्प के सदृश पांच वलयों उन दलों के समान नागरिकों से घिरा हुआ है योगी को इस के मध्य में अरुणोदय काल के करोड़ों स्त्रियों के सदृश कांति वाली विराजित कुंडलिनी शक्ति का ध्यान करना चाहिए इस मध्यमा शक्ति के ध्यान मात्र से योगी को समग्र सिद्धि प्राप्त हो सकती है यह मणिपुर चक्र में ज्योतिष एवं 5 वलियों में विस्तृत कुंडलिनी मध्यम आ सकती है

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कयास

 कयास शब्द अरबी भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ है    माप