Saturday, September 29, 2018

सिद्ध सिद्धांत पद्धति द्वितीय उपदेश षोडश आधार

सिद्ध सिद्धांत पद्धति ग्रंथ के दूसरे उपदेश में षोडश आधारों की चर्चा की गई है जिस में पहला आधार पादन गोष्ट यानी के पैर का अंगूठा है उस अंगूठे के अग्रभाग मे तेजोमय स्वरूप का ध्यान करना चाहिए इस ध्यान से नेत्र ज्योति स्थित होती है जो टी यम यानी दूसरा मूल आधार है इसके सेवन यानी सूत्र को वामन एवं पार्षद यानी पैर की एड़ी से दबा कर बैठा चाहिए इससे शरीर से तेज की वृद्धि होती है अथवा शरीयत अग्नि प्रदीप्त होती है तृतीय मूलाधार विकास संकोच निराकृत अपान वायु भवति तृतीय आधार है इस स्थान पर नियंत्रण कर गुदा का विकास एवं संकुचन प्रसारण एवं पोषण करते हुए साधक उसको इन दोनों से रहित कर दे इससे अपान वायु में स्थिरता आती है चतुर्थ लिंक आधार है जिसको आधार भी कहते हैं यहां लिंग का संकुचन कर योनि मुद्रा की सहायता से वीर्य को उर्दू में करता हुआ साधक ब्रह्म ग्रंथि ब्रह्मा विष्णु महेश ग्रंथियों का भयंकर युद्ध के ऊपरी भाग में विद्यमान गुफा में वीर्य स्तंभन काम करता है इससे अधिक नहीं हो पाता यही रजौली वज्रोली क्रिया है इसके प्रभाव से योगी अखंड ब्रह्मचर्य में स्थित होकर प्राणित हो जाता है वज्रोली क्रिया योग है आधार है मध्य में स्थित है आधार के नियंत्रण से मल मूत्र का संकुचन होता है यार है यानी की नाभि का आधार इसमें एकाग्र चित्त से सहस्त्र रात कमल में स्थित चंद्र मंडल से अमृत का स्राव होता है अमृत पान से शरीर स्वस्थ एवं पुष्ट होता है दशम ताल आधार है यह पर वक्त घंटे का से ऊपर है तालू के अंदर छिद्र मार्ग से जिह्वा को चालन एवं दोहन कर्षण क्रियाओं द्वारा लंबी क्षेत्र में उलट कर प्रविष्ट करना चाहिए इससे मुद्रा किसे दी होती है साधक कास्ट स्थित हो जाता है वस्तुत आधार में खेचरी मुद्रा का अभ्यास एवं अमृत पान दोनों सिद्ध होते हैं इस योग साधक का कास्ट के सदृश निश्चल हो जाना समाज कहलाता है एकादश अर्थात 11 मावा आधार है वहां जिह्वा मूल में साधक के जिह्वा के अग्रभाग को लगाना चाहिए इससे साधक के समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं द्वादश अर्थात 12 मा भूमध्य आधार कहलाता है यहां भूमध्य आधार में चंद्र मंडल का ध्यान करना चाहिए ऐसा करने से साधक के अंगों में शीतलता पुष्टि एवं प्रसन्नता आती है त्रयोदश अर्थात 13 मासिक आधार कहलाता है

नव चक्र निरूपण

सिद्ध सिद्धांत पद्धति ग्रंथ में  द्वितीय उपदेश में 9 चक्र निरूपण इस पिंड में नव चक्र हैं का वर्णन है

प्रथम

ब्रह्म चक्र

मूलाधार में होता है यह तीन बार आवृत गोलाकार के चारों ओर घुमा हुआ त्रिकोण भगमण्डल के सदृश है। उसके समीप ही मूल कंद है वहां योगी को अग्नि के आकार वाली शक्ति का ध्यान करना चाहिए उसी स्थान पर कामरूप पीठ है। जिसके ध्यान करने मात्र से समग्र कामनाओं की पूर्ति हो जाती है।

द्वितीय

स्वाधिष्ठान चक्र

है उस के मध्य में मूंगे के अग्रभाग के सदृश पश्चिम पीछे की ओर मुख वाला शिवलिंग है उसका ध्यान करना चाहिए यही उड्डियान  पीठ भी है इस शिवलिंग की उपासना करने से साधक जगत के प्राणियों को अपनी ओर आकृष्ट करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है।

तृतीय

नाभि चक्र 
है या सर्प के सदृश पांच वलयों उन दलों के समान नागरिकों से घिरा हुआ है योगी को इस के मध्य में अरुणोदय काल के करोड़ों स्त्रियों के सदृश कांति वाली विराजित कुंडलिनी शक्ति का ध्यान करना चाहिए इस मध्यमा शक्ति के ध्यान मात्र से योगी को समग्र सिद्धि प्राप्त हो सकती है यह मणिपुर चक्र में ज्योतिष एवं 5 वलियों में विस्तृत कुंडलिनी मध्यम आ सकती है

अनादि पिंड के पांच अधिष्ठातृदेव


अनादि पिंड के पांच अधिष्ठात्री देव

1अपरम्परम्

2 पर मपदम्

3शून्यम्

4निरञ्जनम्

5परमात्मा

परपिण्डोत्पत्ति


विद्वानों ने कहा है की निजा पारा अपरा सूक्ष्मा अपरा सूक्ष्मा एवं कुंडलिनी in5 शक्तियों में शक्ति चक्र क्रम सद द्वारा सदाशिव प्रकट होते हैं प्रत्येक शब्द के विकास से प्रत्येक पिंड आवेलु भूत होता है इन 5 विंडो के अधिष्ठाता के रूप में 5 दिन होते हैं यही शक्ति चक्र क्रम है शक्ति चक्र त्रिकोण में बिंदु रहता है बिंदु से आशा है विकृत कारण आदिनाथ परमेश्वर परब्रह्म शिव या सदाशिव की सख्त के विकास काल में यह शक्ति इक्षा ज्ञान एवं क्रिया का रूप धारण करती है इन तीनों गौरी लक्ष्मी एवं सरस्वती रूप शक्तियों से उस सर्वव्यापक परमेश्वर शिव का आविर्भाव होता है

कुण्डलिनी शक्ति के पांच गुण

कुण्डलिनी शक्ति के पांच गुण

1.पूर्णता

2प्रतिबिम्बता

3 प्रबलता

4प्रोच्चलता

5 प्रत्यङ्मुखता

सूक्ष्मा शक्ति के पांच गुण

सूक्ष्मा शक्ति के पांच गुण

1निरंशता
2निरन्तरता

3 निश्चलता

4निश्चयता

5निर्विकल्पता

अपरा शक्ति के 5 गुण

अपरा शक्ति के 5 गुण
1 स्फुरता

2 स्फुटता

3.स्फारता

4.स्फोटता

5 स्फूर्तिता

आसपुर

पाराशक्ति के 5 गुण

परा शक्ति के 5 गुणों में अस्तित्व अप्रमेय ता अभिन्न ता

निजा शक्ति के पांच गुण

निजा शक्ति के 5 गुण नित्यता निरंजन ता निस्पंदता निराभासता एवं निरुतथानता गुण का अर्थ होता है स्वभाव और धर्म धर्म का मतलब है कि धारण करना उस के क्या गुण हैं यह दोनों पर्यायवाची शब्द है 1 नित्यता का अर्थ है तीनों कालों में निजा शक्ति का कभी नाश नहीं होता है निरंजन ता का अर्थ है की इसमें काम क्रोध लोभ मो ह राग द्वेष विकार का सर्वथा अभाव रहता है स्पंदन का अर्थ चंचलता उसका अभाव अर्थात चंचलता का अभाव ही निस्पंद ता है निरा भास ता यह भेद रहित एवं प्रतिबिंब रहित है आभास कहते हैं प्रतिबिंब को निरुता नता यह निरुक्त स्थान ता निजा शक्ति का परिणाम रोहित है इसमें श्रेष्ठ का भान नहीं रहता यह सिम में उसी प्रकार अभिनय स्वरूप अर्थ एवं अभिव्यक्त है जैसे चंद्रमा से चांदनी अभिव्यक्त होती है यह पांचों गुणधर्म अवस्था या स्वभाव परमेश्वर आदिनाथ की शक्ति सदा सर्वदा नित्य विद्यमान रहते हैं

Friday, September 28, 2018

परब्रह्म की आदिम 5 शक्तियां एवं उनके गुण

अनामा परा शक्ति अपरा शक्ति सूक्ष्म आ सकती कुंडलिनी शक्ति परब्रह्म की पांच आदिम शक्तियां हैं अनामा नाम रहित है स्वयमेव अभिव्यक्त है अनादि काल से सिद्ध है वह एकमात्र सत्य है वह जन्म एवं मृत्यु से रहित है सिद्ध योगियों का यह सिद्धांत प्रसिद्ध है अर्थात उनका यह निश्चित मत है कि ब्रह्मा सेंड संवेदना है उस ब्रह्म की नजरों की शक्ति इच्छा मात्र धर्म वाली तथा समस्त जीवो के सुख-दुख आज भूखे विषयों के निमित्त सृष्टि एवं प्रलय काल में संकोच तथा विकास स्वभाव वाली प्रसिद्ध है पर आ सकती निजा सकते सहित उस पर ब्रह्म के केवल मानस औलाद सृष्टि की इच्छा उत्साह मातृशक्ति सम्मेलन जगदीश्वरी जागृत होती है अपरा शक्ति उस परम शिव ब्रह्मा में अधिक पर आसक्त के स्वा विभक्त परब्रह्मा में स्पंदन मात्र से क्रिया प्रधान अपरा शक्ति जागृत होती है यह सृष्टि कर्म में परमेश्वर की सहायक होती है इसे ही हिरण्यगर्भ आदि ना मुझसे जान आ गया है सूक्ष्म आ सकती सृष्टि की रचना की इच्छा वाली शक्ति से उस परम शिव में अहंकार मात्र से मैं श्रेष्ठ रचना में समर्थ हूं सूक्ष्मा शक्ति उत्पन्न होती है कुंडलिनी शक्ति वेदम सभा वाली तत्वज्ञान को दिलाने वाली जोकि योगाभ्यास द्वारा प्रबुद्ध होने पर योगी को मोक्ष प्रदान करने वाली होती है इस महा कुंडल ने के उदय होने पर ही योगी परम शिव का साक्षात्कार कर पाता है

सिद्ध सिद्धांत पद्धति प्रथम उपदेश

सिद्ध सिद्धांत पद्धति ग्रंथ गुरु गोरखनाथ के उद्देश्यों का संकलन है इसमें कुल उपदेश है पहला उपदेश पिंडोत्पत्ति है।

शरीर उत्पत्ति का निरूपण सर्वप्रथम गुरु गोरखनाथ ने भगवान आदिनाथ को प्रणाम करके सिद्धांत पद्धति को   उपदेश देना आरंभ किया है।

अंड एवं पिंड के उत्पत्ति विचार काऔचित्य
यद्यपि सत्य विचार में अंडे एवं पिंड की उत्पत्ति का निरूपण बहुत आवश्यक नहीं है तथा श्लोक संग्रह को ध्यान में रखकर के अंड और पिंड पंडित मत  सिद्ध मत में यानी सिद्धों के अनुभव में प्रकाशित है उसका इस पद्धति में पिंड की उत्पत्ति पिंड का विचार पिंड का सम्यक ज्ञान पिंड का आधार पिंड पद समरस भाव एवं श्री नित्या अवधूत इस प्रकार उपदेशों में विस्तृत वर्णन है

अव्यक्त एवं नाम रहित परब्रह्म

जब सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व ना कोई कर्ता है ना कार्य के अभाव में कारण ना कुल शद क्रम या

Saturday, September 15, 2018

योग का शिक्षण

परिचय

योग शिक्षण का उद्देश्य विद्यार्थियों में परिवर्तन लाना और उनको योग को सिखाना है शिक्षक कैसे योग का वातावरण बनाए जिससे शिक्षार्थी स्वयं यौगिक क्रियाओं को योगिक विधियों को सीखें समझे और अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें।

शिक्षण वह विज्ञान है जिसमें तर्क और परंपरागत रूप से पारंपरिक सिद्धांतों और विद्यार्थी के अनुकूल शिक्षण प्रदान किया जाता है संपूर्ण शैक्षिक माहौल विद्यार्थी के लिए सीखने के लिए उत्तरदाई होता है शिक्षण शिक्षार्थी में नेतृत्व और ज्ञान क्षमता को विकसित करता है।

योग का शिक्षण में सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों का लाभ होता है दोनों अच्छे से अच्छे स्वास्थ्य अच्छी संचार कौशल तथा दोनों शिक्षक और शिक्षार्थी योग के माध्यम से अपने तनाव को दूर कर सकते हैं और एक जीवन में एक आनंद और उत्सव का माहौल पैदा कर सकते हैं और जीवन को एक उत्सव बना सकते हैं योगाभ्यासी और योग शिक्षक एक दूसरे के साथ अपने विचार और भावनाओं को सिखाते हैं प्राचीन योग ग्रंथों में शिक्षण के उपरांत विद्यार्थी स्वयं स्वाध्याय करते थे जो उन्हें आंतरिक शांति प्रदान करता था मैत्री उपनिषद में मोनू को परिभाषित किया गया है हम योग में एक गहरे अंतर्मन में प्रतिष्ठित हो जाते हैं जहां से हम जब हम ध्यान की गहराइयों में जाते हैं तो हम एक नया अनुभव एक नई ऊर्जा से ओतप्रोत हो जाते हैं जब हम सवा संस्कृत अभ्यास करते हैं कुछ देर तक करते हैं तो हम यह देखते हैं कि हम कितनी अच्छे ढंग से रिलैक्स हो चुके हैं और हमारा जो अंग अंग में एक नई ऊर्जा का संचार हो चुका है

योग के शैक्षिक माहौल

योगिक शिक्षण में कक्षा का वातावरण स्वच्छ सुंदर होना चाहिए हमें योग की कक्षाएं प्रदूषण रहित वातावरण में लेनी चाहिए सभी योग साधकों को 6 * 3 का के स्थान की आवश्यकता होती है योग का अभ्यास करने के लिए योग्य क्रियाओं को करने के लिए योगाभ्यासी को अपने आश्रम सिंह ले आनी चाहिए जो विद्युत का कुचालक होगा यह काटन या विद्युत का कुचालक हो।

योगिक शिक्षण के क्रम

संपूर्ण योग शिक्षण का उद्देश्य योगाभ्यासी को शांति का अनुभव कराना होता है उसे एक प्रतिकूल और अनुकूल परिस्थितियों में समत्व के भाव विकसित करने होते हैं
योग करने से पहले हम

Friday, September 14, 2018

हे पुरुषोत्तम ब्रह्म क्या है अध्यात्म क्या है कर्म क्या है अधिभूत क्या है अधि दैव

     भगवान श्री कृष्ण से अर्जुन ने पूछा ब्रम्ह अध्यात्म ब्रह्म अध्यात्म कर्म अधिभूत अधिदैव क्या होते हैं किसे कहा जाता है?
   अधियज्ञ कौन है समाहित चित् वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं इस प्रकार अर्जुन ने श्री कृष्ण से 7 प्रश्न किए?

अर्जुन की बातें सुनकर श्री कृष्ण भगवान ने इस संदर्भ में बताया कि अक्षरम ब्रम्ह परमं नहीं होता

Desire—A Metaphysical Evil

Desire—A Metaphysical Evil

As students of Yoga interested in the true welfare of our souls, we must be able to know
what has really happened to us. We should not be wool-gathering, we should not be in a fool’s
paradise even in the name of religion or spirituality. Any kind of outward ritualistic movement
of our personalities, even in the name of religion, is not going to save us, in the end, because this
evil called desire is a metaphysical evil. It is not a social evil, it is not a physical evil. It is a
metaphysical evil, as the philosophers call it. It is a cosmic catastrophe, and therefore, it requires
all the analytical capacity that we are capable of to know what has happened to us, and know how
we can gradually wean ourselves away from this impulse that is dragging us out from ourselves
in the direction of the objects of sense. This weaning oneself away from objects is done very
gradually. The fulfilment of desires is not condemned in the religion of India especially, though
it is well known that desires have to be completely extirpated one day or the other; because, they
are bondages which tether the soul to the body and its physical associations. The great system of
social living and personal living inculcated in India, and accepted by other great philosophers in
other countries also, is known as the Varnashrama system, a highly scientific analysis of the
human situation and the desires of man and the needs of man at different times. We have various
kinds of needs, though all needs may be called desires, and all desires may be called undesirable
things in the end. Yet, when they are there as realities to the senses and the mind, and not lesser
realities than our own bodies and our personalities, we have to tackle them with great caution.
We have to interpret them as realistically as we interpret our own selves. The objects are as real
as ourselves and as unreal as ourselves. To the extent that we are real, the things connected with
us are also real. And to the extent that we are unreal, to the same extent, they are also unreal.
The subject and the object evolve simultaneously. The evolution is not just individualistic and
subjective. So, this system of Varnashrama is a systematic procedure to adjust ourselves and
adapt ourselves to the circumstances of life, horizontally in society, and vertically in our own

personality. The horizontal adjustment is the Varna and the vertical adjustment is the Ashrama.
We have to be complete in society, in our relationships with people, and we have to be complete
in our own selves by a suitable harmonious alignment of the various layers of our personality.
Such an adjustment is very effectively brought about by following the great canons of the Varna
and the Ashrama.

कर्म के पांच गुण

महायोगी गुरु गोरखनाथ के ग्रंथ सिद्ध सिद्धांत पद्धति में कर्म के 5 गुणों की चर्चा प्रथम उपदेश में 63 वें श्लोक में की गई है।
1.शुभम्
2.अशुभम्
3.यशः
4. अपकीर्ति
5.अदृष्टि फल साधनम्

   प्रथम कर्म है शुभ अज्ञान कर्म एवं स्वर्ग आदि प्राप्त सत्कर्म ही शुभ है।
लोक एवम वेद शास्त्र में निंदित असत्य आप प्रेरित कर्म अशुभ कहलाते हैं।
शुभ कर्मों से यश बढ़ता है।
कर्म का चतुर्थ रूप कृति है अशुभ कर्मों से व्यक्ति को आकृति मिलती है।

कर्म का पंचम रूप दृष्ट फल साधन है जिन कर्मों के फल चर्म चक्षु इंद्रिय जन्य ज्ञान के लिए अप्रत्यक्ष होते हैं वह अदृष्ट फल साधन कहे जाते हैं।

सद्गुरु कौन है? सद्गुरु के लक्षण

        


श्री परमहंस स्वामी श्री अड़ गड़ा नंद जी महाराज 




 सद्गुरु कौन है? सद्गुरु के क्या लक्षण है? इस संदर्भ में सिद्ध सिद्धांत पद्धति गोरखनाथ रचित ग्रंथ में पंचम उपदेश में सद्गुरु के लक्षण पर 67 वां 68 वां श्लोक है।
       जो केवल उपदेश मात्र से अनुग्रह मई दृष्टि, करुणा की सतत वर्षा करते हुए शिव स्वरूप परम पद का प्रकाशन कर शिष्य के 8 पाशों  का नाश कर दे तथा उसे स्वरूपानंद में प्रतिष्ठित कर दे वही सद्गुरु है।
8 पाश यानी बंधन पाश का अर्थ होता है बंधन
पहला जरा
दूसरा जन्म
तीसरा मरण
चौथा व्याधि
पांचवा धाम
छठा क्रोध
7वां अभिमान
आठवां अविद्या

Tuesday, September 11, 2018

तनाव और जीवन प्रबंधन में योग की महत्वपूर्ण भूमिका

योग हमें तनाव से बचाता है यह हमें तनाव से बचने और जीवन को एक सहज अवस्था में रखने में मदद करता है योग में तनाव को कम करने के लिए तीन आवश्यक तत्व है शरीर मन एवं श्वास

तनाव मुक्त के लिए योग
चलिए अब हम कु योगासनों प चर्चा करेंग जो हमे तनाव स बचाने में मददगार हैं प्रथ पश्चिमोत्तानासन दूसरा सेतुबंधासन तीसरा शवासन य तीन मुख्य आस ऐसे हैं जो हमें तनाव प्रबंध के साथ सा शरीर क स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण योगदा करते हैं

Monday, September 10, 2018

अपराशक्ति के पांच गुण

स्रोत सिद्ध सिद्धांत पद्धति प्रथम उपदेश

अपरा शक्ति के 5 गुण

स्फुरता

स्फुटता

स्फारता

स्फोटता

स्फूर्तिता

पराशक्ति के पांच गुण

पराशक्ति के 5 गुणों का वर्णन सिद्ध सिद्धांत पद्धति के प्रथम उपदेश में है पराशक्ति के 5 गुण

1 अस्तित्वता

2अप्रमेयता

3अभिन्नता

4.अनंतता
एवं.

5. अव्यक्तता

निजा शक्ति के पांच गुण

, निजा शक्ति के 5 गुण

नित्यता

निरंजनता

निस्पंदनता

निराभासता

एवं निरुत्थानता  है।

स्रोत सिद्ध सिद्धांत पद्धति प्रथम उपदेश

सिद्ध सिद्धांत पद्धति प्रथम उपदेश परब्रह्म की पांच आदिम शक्तियां एवं उनके गुण

परब्रम्ह की पांच शक्तियां एवं उनके गुण
1.अनामा
2.पराशक्ति
3.अपरा शक्ति
4.सूक्ष्मा शक्ति
5.कुंडलिनी शक्ति

  अनामा नाम रहित है स्वयमेव अभिव्यक्त है

पराशक्ति परब्रम्ह के केवल मानस पहलाद श्रेष्ठ की इच्छा उत्साह मात्र से पराशक्ति शिव में लीन जगदीश्वरी जागृत होती है

अपरा शक्ति ब्रह्म में अधिष्ठित पराशक्ति पर ब्रह्मा मैं स्पंदन मात्र से अपरा शक्ति जागृत होती है

सूक्ष्म शक्ति अहंकार मात्र से सृष्टि की रचना में समर्थ है

कुंडलिनी शक्ति तदंतर वेदन स्वभाव तत्व ज्ञान स्वरूप कुंडलिनी शक्ति उदित होती है जो योगाभ्यास द्वारा प्रबुद्ध होने पर योगी को मोक्ष प्रदान करने वाली होती है

Saturday, September 8, 2018

सिद्ध सिद्धांत पद्धति महायोगी गुरु गोरखनाथ जी के ग्रंथ का सार

सिद्ध सिद्धांत पद्धति का अर्थ है कि प्रत्यक्ष अनुभूत सत्य के निश्चित मत का सूक्ष्म मार्ग एकांत स्थान में गुरु के द्वारा निर्दिष्ट साधना के आश्रयण, से गहन ध्यानावस्था में स्थित रहने से उसका अनुभव होने लगता है तथा इसका समापन पूर्णता अथवा समाधि में होता है

सिद्ध सिद्धांत पद्धति में छह विषयों पर गहन विचार विचार किया गया है
1.पिण्ड की उत्पत्ति

2.पिण्ड विचार

3.पिण्ड ज्ञान

4.पिण्ड के आधार

5.पिण्ड पद का समरस भाव

6.एवं अवधूत योगी के लक्षण अधिकारी एवं अनाधिकारी शिष्य

पतंजलि योग सूत्र में ओम का ध्यान और जब के बारे में जानेंगे और योग दर्शन के साधना के बारे में भी इस अंक में जानेंगे

ओम श्री सत गुरुदेव भगवान की जय मैं देवेश कुमार आप सभी का अपने ब्लॉग में स्वागत करता हूं मैंने और आपने हम सभी ने जिन्हें योग में अध्यात्म में रूचि है संभव है उन्होंने योग दर्शन को सुना या पढ़ा भी होगा चलिए आप एक नहीं भी पड़े हैं तुम्हें बताता हूं

अब ध्यान से सुनिए महर्षि पतंजलि कहते हैं प्रणव मतलब ओम इस नाम का इस मंत्र का जब करने से और इसी को भैया बना लेने से ईश्वर की भावना का साक्षात्कार होता है

योगियों का जो मन है जो उनकी साधना पद्धति है उसमें वे लोग ओम यानी प्रणव का बारंबार जप करते हैं जो उनके साधना का उनके जीवन का एक अंग बन जाता है इसीलिए हम जब कभी भी योग की शुरुआत करते हैं तो हम ओम का जब करते हैं
वाचस्पति मिश्र ने ॐ के जप पर विचार और भावनात्मक ध्यान करने के लिए बतलाया है यह सब बातें हम आप सभी को ध्यान और प्रार्थना के संदर्भ में बता रहे हैं यह आपको साधना का मार्ग भी सिखाएगा चलिए जब हम गीता में भी देखते हैं तो भगवान श्री कृष्ण ने ॐ के जप पर बल दिया है और किसी तत्वदर्शी महापुरुष के स्वरूप का ध्यान पर बल दिया है जिससे आपके अंदर योग क्रिया जागृत हो सके

मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना और ध्यान

जब हम कभी अपने स्वास्थ्य के बारे में कुछ भी चिंतित होते हैं प्रार्थना हमारे स्वास्थ्य को स्वस्थ बनाने के लिए योग योग मार्ग में बहुत ही लाभकारी है मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में जब हम प्रकाश डालते हैं तो हम यह पाते हैं हम अपने प्रति तनाव और स्व प्रबंधन के अभाव में हमारा जीवन अस्त व्यस्त हो जाता है शोधों में यह बात सामने आई है की 90% रोगी प्रार्थनाओं के द्वारा दुआओं के द्वारा ठीक होते देखे गए हैं प्रार्थना एक प्रकार से स्वास्थ्य को हीलिंग प्रदान करती है प्रार्थना सभी दवाओं की सभी रोगों की एक अल्टरनेटिव औषध के रूप में कार्य करती है

कुछ महत्वपूर्ण बिंदु ऐसे हैं जिस पर हम प्रकाश डालेंगे की प्रार्थना हमारे स्वास्थ्य को कैसे लाभ पहुंचाती है

1. Relaxation response Prarthana  प्रार्थना मनुष्य को तनावरहित कर देती है तनाव से मुक्त करने में प्रार्थना बहुत ही लाभकारी साधन है

. प्रार्थना उच्च रक्तचाप को कम करने में तथा तनाव को कम करने में प्रार्थना का महत्वपूर्ण योगदान है

2.  दूसरी बात हम यह करेंगे और हम जानने की प्रयास करेंगे प्रार्थना से बहुत कुछ नियंत्रित हो जाता है हम देखते हैं अपने आसपास की बहुत से कार्य प्रार्थना हमसे सफल हो जाते हैं

3 प्रार्थना मनुष्य की संभावनाओं को बढ़ा देती है और आशाओं को जिंदा कर देती है प्रार्थना का स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है

4 प्रार्थना हमारे अंदर प्रेम को अध्यात्म को और आध्यात्मिक प्रेम को आत्मिक आनंद को हमारे भीतर भर देती है यह हमें आत्मोन्नति के मार्ग पर भी ले जाती है प्रार्थना एक अजीब सा सुकून देती है

5. प्रार्थना का मन और आत्मा से जब हम संबंधों की बात करते हैं तो हमें आप आते हैं जब हम शांत होते हैं और अपने अंतर्मन में हम परमात्मा से पुकारते हैं तो हम यह देखते हैं कि हमारे हारमोंस में एक अजीब सा परिवर्तन होता है इस प्रकार से हम नकारात्मक प्रभाव जो तनाव से उत्पन्न होता है और जिसका मनुष्य के प्रतिरक्षा प्रणाली पर बहुत ही बुरा असर पड़ता है उसकी सुधार करता है

प्रार्थना और ध्यान मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत ही आवश्यक है क्योंकि यह बहुत से जटिल समस्याओं को और हमारे अंदर जागरूकता पैदा कर देता है हमारा ध्यान हमारी एकाग्रता को बढ़ाने में ध्यान और प्रार्थना का महत्वपूर्ण योगदान है

Friday, September 7, 2018

Yug Ki Shiksha yoga ki Shiksha

श्रीमद्भगवद्गीता योग सिखाना के दो आयाम हैं इसके कई लाभ हैं जैसे पहला तो हमें लाभ मिलता है कि हमारा जीवन स्वयं उन्नत होता जाता है हम स्वरूप की ओर अग्रसर जाते हैं और दूसरों को भी आत्मोन्नति के मार्ग पर और शरीर स्वास्थ्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण योगदान देने का कार्य करते हैं जो प्रसन्न योग योग को सिखा रहा है दूसरों को उसको तो स्वास्थ्य लाभ मिलेगा ही लेकिन साथ ही साथ वह दूसरों को भी स्वास्थ्य लाभ करा देगा योग शिक्षक खुद में एक आत्मविश्वास पैदा करते हैं और उनकी संचार कौशल का विकास होता है और अपने मन को और अपनी उर्जा को वह विकसित कर पाते हैं सबसे मुख्य बात है की हम योग के माध्यम से तनाव से दूर हो जाते हैं तनाव को खत्म कर पाते हैं और अपने भीतर के आनंद को अनुभव कर पाते हैं और हम जीवन का आनंद ले पाते हैं जैसा भगवान बुद्ध ने संपूर्ण संसार को एक मध्यम मार्ग जिसे अष्टांगिक मार्ग भी कहते हैं का को दिया संपूर्ण भविष्य संपूर्ण विश्व एक शांति के मार्ग पर निकल पड़ा भगवान बुद्ध का विश्व शांति में एक अहम योगदान है

जैसे जैसे आप योग शिक्षक और साधक योग साधकों और योग शिक्षकों का मुख्य दिया होता है कि जब वह लोग किस सिखा रहे हैं जो वायुमंडल है परवेश है उसे शांत शांत और शुद्ध बना देते हैं एनसीईआरटी होगा टेक

The full yogic breath

, the full yogic breath is a wonderful combination of the three types of breathing discussed above

1 Take the position that you followed in above breathing exercises check the position of your head with the rest of your body to be sure it is centred and straight.

2. Begin slowly by inhaling through the nose while keeping the mouth closed let close the air fill your lunch without stopping the moment.

3. Continue to inhale smoothly until your repackage has expanded sideways.
4. Without stopping the breath continue until your chest has expanded and your collar bone has risen

5. Feel the air filling your chest retain your breath but only for as long as you are completely relaxed and comfortable.

6. Now start dying slowly in exact reverse motion allow the beat to follow out and your abdomen to sink

7. Continue to again I slowly as you can only focus on your breath been expelled upward and now reaching for your Rebecca feel the energy of your breath move through the river kids as you continue to exit and explain the energy from your Rib cage into earrings
8. Continue to add gel and will have all the energy of your breath has left your body your chest and collarbone are not fully relaxed

9. It is completely normal if you feel slightly busy or light light and light headed after practicing the full yoga breath in fact this indicates that your brain is being filled with more oxygen than usual and is assigned that you are doing it right

Thursday, September 6, 2018

Introduction to yoga and yogic practices

    Just in this we will learn about yoga and yogic practices.

1., the word yoga refers two different things in today's time the Sanskrit word yoga or yog , is derived from the root yuj, which means to York harness or join together

2. Yoga consists of eight Limbs and it leads to विवेक ख्याति which terms will pave the path of kaivalya that is liberation from the cycle of birth and death

3.  yoga developed note  five thousand years that is a go ago ago but some researcher think that yoga maybe up to 10000 thousands years old.

4. The practice of yoga and yogic asanas that is targets to overcome the limitations of the body in other forms exercises are also good for the health and body but being merely good is not enough.

5. In in Indian traditions and about Darshana when we learn to fill of Indian philosophy there is a very fast concept of yoga ok what is the means of Darshana Darshan that is Darshana simply means vision vision and insight into reality.

6. When we think about the sankhya philosophy that accept three pramanas that is the valid means of acquiring knowledge.
7. The mimamsa system is called Purva mimamsa which means the earlier studies of Vedas.

8. The Vedas Upanishad Puranas and epic are the source to know the Indian philosophy and education.

9., the word Upanishad means sitting down near the Guru when in ancient time in India the sisya that is disciple sitting near the gurus and learning and receiving instructions from the gurus and they destroy their all the confusions about life and everything Dylan the adhyatma that is the spirituality

10. Upanishad are the outlast part of the Vedas Disha generally Upanishad not this or that is a concert Upanishad that is concert is wrong ok I have to remove openly in the form of dialogue open Upanishad are Upanishad r are in the form of dialogue between Guru and the sisters and receipts Guru and this is not the sister ok

11. There are number of recognised parts of yoga office 6 have gained prominence in the ancient culture of India this Paas Aa Jana yoga Bhakti yoga yoga yoga hot yoga and mantra yoga

12 what do you think what is the means of Guru Guru goo means darkness Andrew means that is light light Guru is the one who removes all the darkness in this is life

Definitions of yoga

The term Yog is derived from the suffix of Ganga Tho atmanepada Dwivedi gana Chhath Puja Samaroh hands yoga Hai the meaning of Samadhi that is prevention of all after yoga Chitta vritti nirodhah our mind that it is the source of the product of likewise and the states are respectively brightness and static in its nature and that

What is yoga? What people think about?

With so many aspirants climbing into the bandwagon of yoga how different regions it is becoming more difficult to answer the question what is yoga used teacher uses yoga differently as per the receptor bility level of their students beginner yoga practitioners Aspiring to become teachers search for school that simply teach the kind of yoga they are already used to our are compatible with this changed it mean that yoga is transforming into something vastly different from the original tradition so much so that yoga expert who studied the display about three decades ago sometimes do not recognised as yoga anymore thank you it's a Devesh Kumar Yadav ok have a nice day

Most common misconception about yoga

Yoga is a physical exercises. The fact is that Yoga is a holistic discipline. It can be considered a mean of balancing and harmonizing the body, mind and spirit.

Thanks

Sunday, September 2, 2018

जप करने की विधि

    जप करें चार प्रकार से किया जा सकता है l जप करने के लिए हमें उसे सहज बनाने के लिए एक माला ले सकते हैं |
  जप करें तो किस मंत्र का देखिए श्रीमद्भगवद्गीता ओम् के लिए और राम चरित मानस में राम जपने पर बल दिया गया है | जप की आवश्यकता क्या है |

कयास

 कयास शब्द अरबी भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ है    माप