Saturday, September 29, 2018

सिद्ध सिद्धांत पद्धति द्वितीय उपदेश षोडश आधार

सिद्ध सिद्धांत पद्धति ग्रंथ के दूसरे उपदेश में षोडश आधारों की चर्चा की गई है जिस में पहला आधार पादन गोष्ट यानी के पैर का अंगूठा है उस अंगूठे के अग्रभाग मे तेजोमय स्वरूप का ध्यान करना चाहिए इस ध्यान से नेत्र ज्योति स्थित होती है जो टी यम यानी दूसरा मूल आधार है इसके सेवन यानी सूत्र को वामन एवं पार्षद यानी पैर की एड़ी से दबा कर बैठा चाहिए इससे शरीर से तेज की वृद्धि होती है अथवा शरीयत अग्नि प्रदीप्त होती है तृतीय मूलाधार विकास संकोच निराकृत अपान वायु भवति तृतीय आधार है इस स्थान पर नियंत्रण कर गुदा का विकास एवं संकुचन प्रसारण एवं पोषण करते हुए साधक उसको इन दोनों से रहित कर दे इससे अपान वायु में स्थिरता आती है चतुर्थ लिंक आधार है जिसको आधार भी कहते हैं यहां लिंग का संकुचन कर योनि मुद्रा की सहायता से वीर्य को उर्दू में करता हुआ साधक ब्रह्म ग्रंथि ब्रह्मा विष्णु महेश ग्रंथियों का भयंकर युद्ध के ऊपरी भाग में विद्यमान गुफा में वीर्य स्तंभन काम करता है इससे अधिक नहीं हो पाता यही रजौली वज्रोली क्रिया है इसके प्रभाव से योगी अखंड ब्रह्मचर्य में स्थित होकर प्राणित हो जाता है वज्रोली क्रिया योग है आधार है मध्य में स्थित है आधार के नियंत्रण से मल मूत्र का संकुचन होता है यार है यानी की नाभि का आधार इसमें एकाग्र चित्त से सहस्त्र रात कमल में स्थित चंद्र मंडल से अमृत का स्राव होता है अमृत पान से शरीर स्वस्थ एवं पुष्ट होता है दशम ताल आधार है यह पर वक्त घंटे का से ऊपर है तालू के अंदर छिद्र मार्ग से जिह्वा को चालन एवं दोहन कर्षण क्रियाओं द्वारा लंबी क्षेत्र में उलट कर प्रविष्ट करना चाहिए इससे मुद्रा किसे दी होती है साधक कास्ट स्थित हो जाता है वस्तुत आधार में खेचरी मुद्रा का अभ्यास एवं अमृत पान दोनों सिद्ध होते हैं इस योग साधक का कास्ट के सदृश निश्चल हो जाना समाज कहलाता है एकादश अर्थात 11 मावा आधार है वहां जिह्वा मूल में साधक के जिह्वा के अग्रभाग को लगाना चाहिए इससे साधक के समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं द्वादश अर्थात 12 मा भूमध्य आधार कहलाता है यहां भूमध्य आधार में चंद्र मंडल का ध्यान करना चाहिए ऐसा करने से साधक के अंगों में शीतलता पुष्टि एवं प्रसन्नता आती है त्रयोदश अर्थात 13 मासिक आधार कहलाता है

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कयास

 कयास शब्द अरबी भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ है    माप