#चीन_ने_कोरोना_पर_काबू_कैसे_पाया_होगा?
आज जहां सारा विश्व कोरोना वायरस से जूझ रहा है वहीं जिस जगह से इसका प्रारम्भ हुआ वहां पर एक अद्भुत सी शान्ति है। आज इटली में कोरोना की वजह से मरनेवालों की संख्या चीन से अधिक हो चुकी है। मुझे अभी भी यह रहस्यमय सा लग रहा है कि जिस जगह से इस रहस्यमय बीमारी की शुरुआत हुई वहां पर वह केवल इतनी कम संख्या में लोगों को अपना शिकार बना सकी और नियंत्रित हो गई। चीन की जनसंख्या भी बहुत है। जहां तक जानकारी है 17 नवम्बर 2019 को इसका पहला संक्रमण हुआ और दिसम्बर के अन्त में आधिकारिक तौर पर इसकी घोषणा हुई। लगभग 50 दिनों में किस प्रकार से इसका विस्तार केवल वुहान और हुबई प्रांत में सीमित रह गया? इटली में पहला संक्रमित व्यक्ति 31 जनवरी को पकड़ में आया। इन 50 दिनों में इसके फैलने की गति अद्भुत है जबकि हमको ये पता चल चुका था कि इसके विस्तार को कैसे कम किया जा सकता है। मैं तो जब इस बीमारी को फैलने से बचने के लिए की जानेवाली सावधानियों के बारे में पढ़ता हूं तो यही लगता है कि इस वायरस के संक्रमण से बच पाना यदि असम्भव नहीं तो अत्यन्त कठिन अवश्य है। यूं तो बहुत सारे लोगों को चीन में इस बीमारी से मरने वालों की प्रशासनिक स्तर पर सूचित संख्या पर विश्वास नहीं है और मैं भी उनमें से एक हूं। परन्तु संख्या चाहे जो भी रही हो, इतने कम समय में इस को नियंत्रित करने में चीन कैसे सफल हुआ होगा यह बहुत ही आश्चर्यचकित कर देनेवाली घटना है। अभी अमेरिका के विश्लेषक यह आशंका व्यक्त कर रहे हैं कि हो सकता है कि इस समस्या को नियंत्रित होने में डेढ़ वर्ष तक लग जाएं। कैसे चीन में यह बीमारी नियंत्रण में अाई होगी इसका संकेत युवल नोआ हरारी का आलेख पढ़ने से मिलता है। इस लेख का लिंक कॉमेंट में दिया गया है। मुझे निश्चित रूप से लगता है कि कुछ उसी तरह से यह बीमारी चीन में नियंत्रित हुई होगी। इस बीमारी के फैलाव को रोकने के लिए जिस तरह से लोगों को एक दूसरे से विविक्त करने की अत्यन्त आवश्यकता होती है और यह जानने की आवश्यकता होती है कि कौन सा व्यक्ति किस व्यक्ति के सम्पर्क में आया है, वह किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में व्यक्ति की निजता का हनन माना जायेगा। सामान्य परिस्थितियों में कोई भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था उस प्रकार से व्यक्ति की निजता में घुसपैठ करने की अनुमति नहीं दे सकती। चीन में जिस प्रकार की शासन व्यवस्था है उसमें वैयक्तिक स्वतन्त्रता और निजता उस प्रकार से संरक्षित नहीं रहती। लेकिन सरकार के पास हर व्यक्ति की समग्र जानकारी रह पाना आसान होता है। चीनी सरकार के पास असीमित अधिकार हैं जिससे वह जान सके कि कौन व्यक्ति किस किससे मिल रहा है और कहां कहां जा रहा है। उसके लिए मोबाइल नम्बर आदि से लेकर बहुत सारे साधन हो सकते हैं। यह सब कुछ इतना डरावना है कि यह जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास 1984 की याद दिलाता है। हम एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में रह रहे हैं। सम्भवतः इस संकट से बचाव में लोकतान्त्रिक व्यवस्थाएं उतनी सक्षम नहीं हैं जितनी कि सत्तावादी शासन व्यवस्थाएं। इस संकट के समाप्त होने तक शायद यह दुनिया बहुत कुछ बदल चुकी होगी जैसा कि युवल नोआ हरारी सम्भावना व्यक्त कर रहे हैं। लोगों के लिए तो यही कहना उचित और आवश्यक लगता है कि जितना हो सके दिये गए निर्देशों का पालन करें। हम और आप इस विभीषिका के असली रूप से अभी भी अपरिचित ही हैं।
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